परोपकार
नास्ति हव्यस्य व्याघात:
देवताओ को नियमित दिया गया द्रव्य कभी नष्ट नहीं होता | अर्थात योग्य पात्र को दिया गया दान कभी भी व्यर्थ नहीं जाता,,
समाज के योग्य व्यक्ति कि सहायता करना भी समाज कि सेवा हि है,, जो व्यक्ति समाज कल्याण मे अपना मन लगाते है,वे अप्रत्यक्ष रूप से अपना हि कल्याण करते है ||
. चाणक्य.
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