नीति शास्त्र
अहो बत विचित्राणी चरीतानी महात्मनाम् |
लक्ष्मी तृनाय मन्यन्ते तदभारेंण नमन्ति च ||
सज्जन धन को तिनके के समान अर्थात अर्थहीन समझते है, परन्तु यदि इनके पास धन आ जाए तो वे और भी नम्र हो जाते है, अर्थात धन के आने पर भी उन्हें अभिमान नहीं होता |
वे उसी प्रकार झुक जाते है, जिस प्रकार फलो से लदे हुए वृक्ष की टहनिया नम हो जाती है.!!
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