गीता के अनुसार अध्यात्म
अध्यात्म एक ऐसा शब्द है जिसे परिभाषित करना कठिन है। जिन्होंने भी इसके संबंध में जो कुछ कहा है, अपने अनुभव के आधार पर कहा है। अध्यात्म का अर्थ है अपने भीतर के चेतन तत्त्व को जानना। गीता के आठवें अध्याय में अपने स्वरुप अर्थात् जीवात्मा को अध्यात्म कहा गया है ‘परमं स्वभावोऽध्यात्मुच्यते’। आज के समय में योग, प्राणायाम और ध्यान को ही अध्यात्म समझा जाता है। परन्तु इसे जानने के लिए ये केवल साधन मात्र हैं। इन विधियों के द्वारा अध्यात्म को जानने की साधना की जाती है। अध्यात्म इन सभी विद्याओं से परे है, यह महाविद्या है। इसे जान लेने के पश्चात और किसी विषय-वस्तु को जानने की आवश्यकता नहीं होती। ‘आत्मनि अधि इति अध्यात्म:’ अध्यात्म के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति होती है। अर्थात् इसके द्वारा जीवन और मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है।
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